पर उसे चलना था वही से..मंजिल उसकी वही थी
अपनोंसे दूर जाना था
क्युंकि उसे सच्चाई के साथ रहना था
पतली राहे और काँटोंसे भरे रस्ते
हँसते रहे उसपे खुद उसकेही दोस्त अपने
कभी घबराता वो भी , कुछ गलत तो नहीं हो गया
सोच था जैसा वो सूरज, क्यों अब तलक नहीं आया ?
छाले बहुत पड़े उसके हाथो मैं ,लेकिन वो सूरज की गरमी से नहीं डरा
हाँ सच है ये मगर वो सूरज अकेला नहीं ला पाया
सोच था जैसा वो सूरज, क्यों अब तलक नहीं आया ?
छाले बहुत पड़े उसके हाथो मैं ,लेकिन वो सूरज की गरमी से नहीं डरा
हाँ सच है ये मगर वो सूरज अकेला नहीं ला पाया
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