Wednesday, November 2, 2011

दिवसा काजव्याचं माझं अस्तित्व
तुझ्या सहवासात रातराणिसारखं फूलतयं
कक्षा रुन्दावल्यात , परिघ मोठा झालाय
किंवा कदाचित ह्या वर्तुलाचं केंद्र्च बदललयं

Tuesday, August 23, 2011

कविता करू नकोस म्हणाली ती
टोचतात ....
म्हणजे आता जखमेवर खपली पण नाही
किमान थोड़ी धार तरी कमी कर
पण मग अश्या बोथट शस्त्राने काय नेम साधणार
थोडा विचार कर ना माझी लेखणी टोचणी का होतिए
कदाचित माझ्या आयुष्यातली तुझी कमी ती दाखवतीए ..

Wednesday, August 17, 2011

साहिल पर बैठे
हमने खूब ग्यान दिया था
अब जब दरिया मैं डुबे हैं तो
सहारे का मतलब जाना हैं

कुछ इस कदर फ़िदा हैं वो हमपे
के समज़ना भी नहीं चाहते
मोतीयोंके दाम पत्थर चुन चुके हैं वो

Monday, July 11, 2011

अपनोने कहा तू प्रवाह की गलत और खड़ा है
पर उसे चलना था वही से..मंजिल उसकी वही थी
अपनोंसे दूर जाना था
क्युंकि उसे सच्चाई के साथ रहना था
पतली राहे और काँटोंसे भरे रस्ते
हँसते रहे उसपे खुद उसकेही दोस्त अपने
कभी घबराता वो भी , कुछ गलत तो नहीं हो गया
सोच था जैसा वो सूरज, क्यों अब तलक नहीं आया ?
छाले बहुत पड़े उसके हाथो मैं ,लेकिन वो सूरज की गरमी से नहीं डरा
हाँ सच है ये मगर वो सूरज अकेला नहीं ला पाया




Monday, June 27, 2011

बिजली की वो अनोखी बाला
लेकर भागा एक बादल काला
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चमक उलट झलक झलक के
अपनों पे ही गरज गरज के
खाँक हो गयी बिजली मिट्टी मैं
देख काला वो आग का धुँआ
देखो फिर काला बादल मुस्काया
तेरी रुसवाई जाने और कितने रंग दिखलाएगी
भीड़ मैं भी हमे सिर्फ तुम संग छोड़ जाएगी
हर लम्हा तुम संग जीने पर मजबूर हैं हम
दुनिया जिसे तेरा दीवाना कहती हैं , वहि हैं हम
खुशियाली भरी पड़ी थी जब तक थे वो
प़र काँट हमारे , खुशियोंसंग उड़ गए वो

अम्बिया पर टंगे उस झुले पर
आज कोई नया परिंदा झुमना चाहता हैं
हमारे संग और कोई प्यार से
बतियाना चाहता हैं
आने का वादा करनेवाले यादोंमेही आते हैं
जाते हुए हमे , हमारी अपनी दुनिया से भी रुसवा कर जाते हैं


Friday, May 27, 2011

बिछडें जब हम तो पलकें दोनोंकी भरी थी
हमारी आसुओंसे तो उनकी नए सपनोंसे
गम से बेजार हम , अपनोंके सामने खुल के रो भी सके
पर जाने कैसे ये हसरत भी हमारी पूरी हो गयी
अचानक गरमी के मौसम मैं आसमान रो पड़ा
और बुन्दोमें हमारे आसुओंको पनाह मिल गयी



Saturday, March 12, 2011

वो सुबह ही क्या
जिसमे तेरे हाथोंकी चाय हो
वो दिन ही क्या
जिसमे तेरी पायल की छनछनाट हो
वो फिजा ही क्या
जिसमे तेरे ज़ुल्फोंकी मेहक हो
और वो जिंदगी ही क्या
जिसमे तू हो

Monday, January 31, 2011

आणि आज ती माझ्या घरी आली
घरभर रुणझुणली..सगळ्यांशी चिवचिवली
तिची भिरभिर नजर माझं आभाळ देखील स्पर्शून आली
आणि मग थोडीशी हिरमुसली.......
लूकलूकती सगळ्यांकडे पाहून
शेवटी माझ्याच कुशीत येऊन विसावली

Thursday, January 13, 2011

छानी माझी सोनुकली ती
कुणाकडे गं पाहत होती
कोण बरे त्या संध्येतुन
हळूच पाहते डोकावून
तो रविकर का गोजिरवाणा
आवडला आमुच्या राणीला
लाजलाजली ह्या वचानानी
साधी भोळी ती फुलराणी