उस सोच को बदल के सोच जरा
इस सोच की वजह सोच जरा
उस राह का अंत देख जरा
इस राह की मंजिल देख जरा
वो कांच की दुनिया छोड़ जरा
ये काँटों भरी सांझ देख जरा
इस सोच की वजह सोच जरा
उस राह का अंत देख जरा
इस राह की मंजिल देख जरा
वो कांच की दुनिया छोड़ जरा
ये काँटों भरी सांझ देख जरा
वहाँ न तेरा कोई अपना है, मिट्टी भी नहीं ,
सब कुछ छू मन्तर एक सपना है
यहाँ का आसमाँ तक तेरा है,
हर आँख का तू ही सपना है
दिशा ढूंढता एक बहाव न बन
टस से मस न होने वाला पहाड़ भी ना बन
ठेहराव और बहाव को संग बांधता
तू नया युवा बन
तू नया युवा बन ..
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