Friday, August 20, 2010

Yuva

उस सोच को बदल के सोच जरा
इस सोच की वजह सोच जरा
उस राह का अंत देख जरा
इस राह की मंजिल देख जरा
वो कांच की दुनिया छोड़ जरा
ये काँटों भरी सांझ देख जरा

वहाँ तेरा कोई अपना है, मिट्टी भी नहीं ,
सब कुछ छू मन्तर एक सपना है
यहाँ का आसमाँ तक तेरा है,
हर आँख का तू ही सपना है
दिशा ढूंढता एक बहाव बन
टस से मस होने वाला पहाड़ भी ना बन
ठेहराव और बहाव को संग बांधता
तू नया युवा बन
तू नया युवा बन ..

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